निजी क्षेत्र ने महामारी से भी अधिक परियोजनाएं छोड़ीं, निवेश सुस्ती ने अर्थव्यवस्था को दिया झटका

सीएमआईई से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों ने सितंबर तक लगातार चार तिमाहियों के आधार पर लगभग 14.3 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजनाएं छोड़ दी हैं निजी क्षेत्र ने व्यापार और अन्य मुद्दों को लेकर चल रही…

निजी क्षेत्र ने महामारी से भी अधिक परियोजनाएं छोड़ीं, निवेश सुस्ती ने अर्थव्यवस्था को दिया झटका

Last Updated: March 11, 2026 | 4:35 PM IST

हाइलाइट्स

  • सीएमआईई से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों ने सितंबर तक लगातार चार तिमाहियों के आधार पर लगभग 14.3 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजनाएं छोड़ दी हैं निजी क्षेत्र ने व्यापार और अन्य मुद्दों को लेकर चल रही…

सीएमआईई से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों ने सितंबर तक लगातार चार तिमाहियों के आधार पर लगभग 14.3 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजनाएं छोड़ दी हैं

निजी क्षेत्र ने व्यापार और अन्य मुद्दों को लेकर चल रही अनिश्चितताओं के बीच मौजूदा निवेश करने से पहले ज्यादा सावधानी बरतना शुरू किया है और निवेश से हाथ खींच लिया है जबकि कोविड-19 महामारी जैसी बाधाओं वाली मुश्किल परिस्थितियों के दौरान भी निजी क्षेत्र इतना पीछे नहीं हटा था।

निजी क्षेत्र ने जिन परियोजनाओं से हाथ खींचा है उनमें आमतौर पर नए कारखाने की स्थापना  और अन्य पहल शामिल हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों ने सितंबर तक लगातार चार तिमाहियों के आधार पर लगभग 14.3 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजनाएं छोड़ दी हैं। यह आंकड़ा महामारी के दौरान छोड़ी गई परियोजनाओं के उच्चतम स्तर करीब 9.1 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक है। यह 2011 से उपलब्ध किसी भी अवधि से भी ज्यादा है, जिसमें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और नोटबंदी जैसी अवधियां भी शामिल हैं।

इस दौरान, सरकार द्वारा छोड़ी गई परियोजनाओं के मूल्य में कमी आई है जिससे यह पता चलता है कि निजी क्षेत्र के कदम पीछे खींचने के बावजूद सरकार अपनी परियोजनाओं पर काम जारी रख रही है।

एमके ग्लोबल की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा के अनुसार,अमेरिकी व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितताओं और निजी खपत की कमी के संयोजन ने निजी पूंजीगत व्यय में सुस्ती ला दी है। कुछ क्षेत्रों ने अनुकूल व्यापार समझौते की उम्मीद में अपने इरादे जताए होंगे जो नहीं हो पाया है। कमजोर वृद्धि के बीच कम मांग ने भी निजी पूंजीगत व्यय को प्रभावित किया है। वर्ष 2025-26 की आखिरी दो तिमाहियों  में खपत में तेजी आने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, ‘आगे खपत में सुधार  इस बात को निर्धारित करने में एक महत्त्वपूर्ण कारक हो सकता है कि पूंजीगत व्यय में कितनी तेजी से उछाल आती है।’

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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के तिमाही ऑर्डर बुक्स, इन्वेंटरीज और क्षमता उपयोगिता सर्वेक्षण ने जून 2025 को समाप्त होने वाली तीन महीनों के लिए 75.8 प्रतिशत मौसमी आधार पर समायोजित क्षमता उपयोग दर्ज किया। कंपनियां आमतौर पर अतिरिक्त क्षमता बनाने में तभी निवेश करती हैं जब मौजूदा क्षमता का उपयोग पूरी तरह हो जाने के बाद मांग पूरी करने में असमर्थता के संकेत मिलने लगते हैं।

हालांकि, अरोड़ा ने आगे कहा कि निजी खपत में वृद्धि से क्षमता उपयोग के अभी 80 प्रतिशत से आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं है। उनके अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र पूंजीगत व्यय को बढ़ावा दे रहा है और यह रुझान जारी रहने की उम्मीद है। सड़क और बुनियादी ढांचे जैसे इस तरह के खर्च से जुड़े क्षेत्र में कुछ तेजी देखने को मिल सकती है। बिजली उत्पादन और डेटा सेंटर अन्य क्षेत्र हैं जिनके लिए निवेश का दृष्टिकोण अनुकूल है।

स्वतंत्र बाजार विश्लेषक आनंद टंडन ने कहा, ‘अमेरिका के साथ व्यापार सौदा उम्मीद से कहीं ज्यादा समय तक टलता दिख रहा है, जिसका असर निर्यात वाले क्षेत्रों पर पड़ेगा।’

उन्होंने कहा कि इस बीच निचले-स्तर की विनिर्माण नौकरियों पर असर पड़ सकता है जबकि उच्च-स्तरीय आईटी नौकरियां भी कुछ अनिश्चितता का सामना कर रही हैं। खपत पर इसके प्रभाव पर करीब से नजर रखनी होगी। क्षेत्रवार आंकड़ों से पता चलता है कि बिजली और विनिर्माण उन क्षेत्रों में शामिल हैं जो सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं, जिनमें से प्रत्येक में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं रद्द हुई हैं। वहीं गैर-वित्तीय सेवाओं ने बेहतर प्रदर्शन किया है।

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टाटा म्युचुअल फंड के वरिष्ठ फंड मैनेजर चंद्रप्रकाश पडियार ने सुझाव दिया कि सूचीबद्ध कंपनियों में अपेक्षाकृत अधिक लचीलापन हो सकता है। कई कंपनियों के पास अब भी बड़ी निवेश योजनाएं हैं, खासतौर पर रियल एस्टेट, ऊर्जा (बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण) के साथ-साथ डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में। टंडन ने कहा, ‘मुझे सही मजबूती दिखाई देती है। निर्यात-उन्मुख कंपनियां स्पष्टता का इंतजार करते हुए अपनी योजनाओं को रोक सकती हैं। लेकिन घरेलू खपत में तेजी आने की संभावना है क्योंकि आरबीआई बैंकों के लिए नकदी को सुगम बना रहा है जिसका वित्त वर्ष 2027 से खपत पर सकारात्मक असर होना चाहिए।’

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India-US LPG Deal: भारत की खाड़ी देशों पर घटेगी निर्भरता, घर-घर पहुंचेगी किफायती गैस

भारत ने अमेरिका से 2.2 मिलियन टन एलपीजी का ऐतिहासिक समझौता कर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया। India-US LPG Deal: भारत ने अमेरिका के साथ 2.2 मिलियन…

Last Updated: November 22, 2025 | 7:01 AM IST

हाइलाइट्स

  • भारत ने अमेरिका से 2.2 मिलियन टन एलपीजी का ऐतिहासिक समझौता कर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया। India-US LPG Deal: भारत ने अमेरिका के साथ 2.2 मिलियन टन (mt) एलपीजी का टर्म डील किया है। यह कदम…
India-US LPG Deal: भारत की खाड़ी देशों पर घटेगी निर्भरता, घर-घर पहुंचेगी किफायती गैस
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भारत ने अमेरिका से 2.2 मिलियन टन एलपीजी का ऐतिहासिक समझौता कर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया।

India-US LPG Deal: भारत ने अमेरिका के साथ 2.2 मिलियन टन (mt) एलपीजी का टर्म डील किया है। यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजार में उत्पन्न होने वाली अनिश्चितताओं के बीच भारत की सुरक्षा को मजबूत करेगा। इस समझौते के अनुसार, 2026 से भारत की सरकारी तेल कंपनियां (OMCs) देश में कुल एलपीजी का 10 प्रतिशत अमेरिका से आयात करेंगी।

अब तक भारत का अमेरिका के साथ एलपीजी आयात में कोई टर्म डील नहीं था। देश की घरेलू एलपीजी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात पर निर्भर है और वर्तमान में 90 प्रतिशत एलपीजी आयात पश्चिम एशियाई देशों जैसे संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब और कुवैत से होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका से एलपीजी आयात करने का निर्णय भारत के लिए स्रोत विविधता बढ़ाने में मदद करेगा और पश्चिम एशियाई देशों पर निर्भरता कम करेगा। इक्रा के सीनियर उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ ने कहा कि अमेरिका प्राकृतिक गैस तरल पदार्थों का बड़ा उत्पादक है। अमेरिका से एलपीजी आयात करना चल रही व्यापार वार्ता के अनुरूप है और यह वैश्विक राजनीतिक तनाव के समय भारत के लिए फायदेमंद होगा।

इस साल की शुरुआत में ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष के कारण हॉर्मुज की खाड़ी बंद होने का खतरा पैदा हुआ था, जिससे भारत की एलपीजी सप्लाई पर असर पड़ सकता था।

भारत के तेल मंत्री हर्षदीप सिंह पुरी ने कहा कि यह करार देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा और लाखों घरों को किफायती और साफ-सुथरी खाना पकाने वाली गैस उपलब्ध कराने में मदद करेगा। हालांकि उन्होंने इस करार की कीमत का खुलासा नहीं किया। मंत्री ने बताया कि इस करार में अमेरिकी एलपीजी खरीद की कीमत का आधार माउंट बेल्व्यू, अमेरिका का एक प्रमुख एलपीजी मूल्य निर्धारण केंद्र, होगा।

मरीन इंटेलिजेंस फर्म Kpler की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत ने अब तक 36% एलपीजी यूएई से, 21% कतर से, 16% कुवैत से और 6% अमेरिका से आयात किया है। पिछले तीन सालों में अमेरिका का हिस्सा केवल 0.5% से 2% तक रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका से आने वाली एलपीजी भारत के लिए महंगी होगी क्योंकि समुद्री रास्ता लंबा है। Kpler के सीनियर एनालिस्ट सियारन टायलर के अनुसार, “भारतीय कंपनियों को अमेरिका से आने वाली एलपीजी के लिए मध्य पूर्व से आने वाले मुकाबले ज्यादा कीमत चुकानी होगी। अमेरिका से जहाज भारत पहुंचने में लगभग 45 दिन लगते हैं, जबकि मध्य पूर्व से सिर्फ 7-8 दिन।”

हाल ही में LPG (तरल पेट्रोलियम गैस) की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट और अमेरिका के साथ लागत पर चल रहे समझौतों से भारत की कंपनियों को महंगे फ्रेट का असर कम करने में मदद मिल सकती है।

ICRA के विशेषज्ञ वशिष्ठ के अनुसार, “अप्रैल से अंतरराष्ट्रीय LPG की कीमतें कम हुई हैं। सऊदी CP (कॉन्ट्रैक्ट प्राइस) में भारी कमी आई है और कच्चे तेल की कीमतें $60-$65 प्रति बैरल के आसपास स्थिर रहने की संभावना है। इससे भारत अमेरिका से LPG आयात बढ़ा सकता है। फ्रेट लागत जरूर अधिक होगी, लेकिन अमेरिका भारत को बेहतर कीमत देने का प्रयास कर सकता है ताकि असर कम हो।”

LPG, जो कि ब्यूटेन और प्रोपेन का मिश्रण है, की कीमतें कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों से जुड़ी होती हैं, क्योंकि इसे इन ईंधनों के रिफाइनिंग के दौरान बनाया जाता है। अक्टूबर में सऊदी अरामको ने ब्यूटेन और प्रोपेन के लिए बेंचमार्क कॉन्ट्रैक्ट प्राइस अगस्त 2023 के बाद सबसे कम $475 और $495 प्रति टन तय किए।

ऊर्जा क्षेत्र: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की अहम भूमिका

जैसे ही भारत और अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर बातचीत कर रहे हैं, ऊर्जा क्षेत्र इस समझौते को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि दोनों देश “काफी करीब” हैं एक उचित व्यापार समझौते पर पहुंचने के लिए और अमेरिका भारत पर लगाए गए कुछ टैरिफ पर पुनर्विचार कर सकता है।

अगस्त में, अमेरिका ने भारत पर रूस से ऊर्जा खरीदने के लिए 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया था, जिससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत हो गया।

इसके अलावा, भारत ने 2025 में अमेरिका से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाई है। अक्टूबर में भारतीय रिफाइनर ने मार्च 2021 के बाद सबसे अधिक मात्रा में अमेरिका से कच्चा तेल आयात किया। ट्रंप ने भारत से व्यापार घाटा कम करने के लिए यह कदम उठाने के लिए कहा था।