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निर्यात संवर्धन मिशन के तहत बनेगी कार्यान्वयन प्रक्रिया, MSME और निर्यातकों को मिलेगा नया समर्थन

निर्यात संवर्धन मिशन के कार्यान्वयन ढांचे को तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई है ताकि निर्यातकों और एमएसएमई क्षेत्रों को आवश्यक सहायता दी जा सके निर्यात संवर्धन मिशन (ईपीएम) का तात्कालिक ध्येय अब इस योजना के कार्यान्वयन ढांचे को…

Last Updated: March 11, 2026 | 4:35 PM

हाइलाइट्स

निर्यात संवर्धन मिशन के कार्यान्वयन ढांचे को तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई है ताकि निर्यातकों और एमएसएमई क्षेत्रों को आवश्यक सहायता दी जा सके

निर्यात संवर्धन मिशन (ईपीएम) का तात्कालिक ध्येय अब इस योजना के कार्यान्वयन ढांचे को स्थापित करने और निर्यातकों का समर्थन करने के उद्देश्य से योजनाओं के लिए विस्तृत प्रक्रियाओं को अंतिम रूप देना है। सरकारी अधिकारियों ने इस योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी दिए जाने के अगले दिन दी।

दिशानिर्देशों को अंतिम रूप देने में दो-तीन महीने लग सकते हैं। इस बीच सरकार बाजार पहुंच पहल (एमएआई) योजना के तहत लगभग 300 करोड़ रुपये के बकाया को जल्द से जल्द चुकाने और निर्यात बाजारों के विविधीकरण में मदद करने के लिए क्रेता-विक्रेता बैठकों को तेज करने को प्राथमिकता देगी। ब्याज समानीकरण योजना (आईईएस) को 31 दिसंबर, 2024 से आगे विस्तार नहीं मिला। इसे फिर से शुरू किया जाएगा लेकिन मौजूदा व्यापार जरूरतों के अनुरूप इसे नया रूप दिया जाएगा।

वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को  बताया कि योजना से केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों को लाभ उठाने की अनुमति दी जाएगी और यह ‘सभी के लिए मुफ्त’ प्रकार की योजना के बजाए मोटे तौर पर एमएसएमई पर लक्षित होगी।

अधिकारी ने बताया, ‘अब जब मंत्रिमंडल की मंजूरी मिल गई है तो अगला कदम कार्यान्वयन ढांचे को एक साथ रखना होगा। सभी योजनाएं एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म – ट्रेड कनेक्ट के माध्यम से संचालित की जाएंगी। ईपीएम के तहत लाभ चाहने वाले निर्यातकों को अद्वितीय पंजीकरण दिया जाएगा।’ अधिकारी ने कहा, ‘हमें प्रत्येक योजना के लिए परिव्यय के बारे में व्यापक आकलन करने की आवश्यकता है। विस्तृत प्रक्रियाओं को अगले दो-तीन महीनों में अधिसूचित किया जाएगा।’

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने छह साल की अवधि के लिए निर्यात संवर्धन मिशन बुधवार को मंजूर किया। इसका ध्येय भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा को मजबूत करना और अमेरिका के 50 प्रतिशत शुल्क की चुनौतियों से जूझ रहे निर्यातकों व श्रम-गहन क्षेत्रों जैसे कपड़ा, चमड़ा, रत्न और आभूषण, इंजीनियरिंग सामान  और समु्द्री उत्पादों को मदद करना है।

ईपीएम को दो उप-योजनाओं के माध्यम से लागू किया जाएगा – 10,401 करोड़ रुपये के लागत वाली निर्यात प्रोत्साहन योजना और 14,659 करोड़ रुपये के लागत वाली निर्यात दिशा योजना। इसमें निर्यात प्रोत्साहन योजना व्यापार को वित्तीय सुविधा मुहैया करवाएगी। हालांकि निर्यात दिशा योजना अंतरराष्ट्रीय मार्केट तक पहुंच को बढ़ावा देगी।

First Published - November 22, 2025 | 7:37 AM IST
होम / अर्थव्यवस्था / फाइनेंस / ग्रीन हाइड्रोजन लक्ष्य में बदलाव, 2030 तक 30 लाख टन उत्पादन का नया टारगेट

ग्रीन हाइड्रोजन लक्ष्य में बदलाव, 2030 तक 30 लाख टन उत्पादन का नया टारगेट

वैश्विक नीतिगत अनिश्चितताओं और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन का लक्ष्य संशोधित किया है। अब 2030 तक 30 लाख टन, 2032 तक 50 लाख टन उत्पादन का…

aarti gosavi

Last Updated: March 11, 2026 | 4:34 PM IST

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हाइलाइट्स

  • वैश्विक नीतिगत अनिश्चितताओं और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन का लक्ष्य संशोधित किया है। अब 2030 तक 30 लाख टन, 2032 तक 50 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को लेकर वैश्विक नीतिगत…
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वैश्विक नीतिगत अनिश्चितताओं और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन का लक्ष्य संशोधित किया है। अब 2030 तक 30 लाख टन, 2032 तक 50 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को लेकर वैश्विक नीतिगत अनिश्चितताओं के कारण 50 लाख टन सालाना (एमएमटीपीए) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का भारत का लक्ष्य दो साल पीछे यानी 2032 तक खिसकने की संभावना है।

Green Hydrogen पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के मौके पर नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के सचिव संतोष सारंगी ने मंगलवार को कहा कि पहले के लक्ष्यों में संशोधन करके अब देश में 2030 तक 30 लाख टन सालाना  ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करने का लक्ष्य रखा गया है। भारत सरकार ने जनवरी 2023 में नैशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (एनजीएचएम) की शुरुआत की थी। इसका मकसद भारत को ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन व निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है। इसके तहत 2030 तक सालाना 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था।

सारंगी ने कहा कि यूरोप में नीतिगत अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) द्वारा नेट जीरो फ्रेमवर्क (एनजेडएफ) को 1 साल तक के लिए टालने के फैसले के बाद भारत के लक्ष्य में बदलाव किया गया है।

उन्होंने कहा कि निर्यात पर केंद्रित भारतीय कंपनियां ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन लक्ष्यों को फिर से समायोजित कर सकती हैं, जबकि अन्य घरेलू कंपनियों जल्द ही परियोजनाएं शुरू कर सकती हैं।

सारंगी ने कहा, ‘ग्रीनको, एक्मे, सेंबकॉर्प जैसी कंपनियां सक्रिय रूप से साझेदार तलाश रही हैं और वे अपेक्षाकृत सफल रही हैं।’

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